# रोजनामचा 

By [Atul Arora](https://dylit.info/user/atul_1102)

[झाड़े रहो कलक्टरगंज ](https://dylit.info/pr/%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%87-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%9C/6a189bb592457128cb2f9161) > [रोजनामचा ](https://dylit.info/ch/%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%BE/6a189bc892457128cb2f9190)

झाड़े रहो कलेक्टरगंज - ठेठ् कानपुरिया जुमले की कहानी, सुनिए कानपुरिया अंदाज़ में बर्फबारी के बीच कानपुर के सबसे मशहूर और ठेठ जुमले "झाड़े रहो कलेक्टरगंज" की अनसुनी कहानी! क्या आप जानते हैं कि कानपुरिया अंदाज़ का यह जुमला कहाँ से आया और इसका मतलब क्या है? और इसका पूरा रूप "मंडी खुली बजाजा बंद, झाड़े रहो कलेक्टर गंज" क्यों है? इस वीडियो में, अतुल अरोरा आपको नवाबियत और कानपुरियत से भरे लहजे में इस मशहूर व्यंग्यात्मक मुहावरे की उत्पत्ति और इसके पीछे के दिलचस्प किस्से के बारे में बता रहे हैं। 📍 आप क्या जानेंगे: झाड़े रहो कलेक्टरगंज का असली और पूरा जुमला क्या है। यह जुमला कानपुर की कलेक्टरगंज मंडी और एक रंगबाज़ पल्लेदार की कहानी से कैसे जुड़ा। यह मुहावरा उन लोगों पर एक कटाक्ष कैसे है जो अपनी औकात से ज़्यादा शानो-शौकत दिखाते हैं (याद करें: "घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने")। फिल्म पाकीजा के एक सीन का ज़िक्र, जो इस जुमले की भावना को दर्शाता है। अगर आप कानपुर, लखनऊ और हिंदी साहित्य से जुड़े मुहावरों की कहानियों में रुचि रखते हैं, तो अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ से 10 मिनट निकालिए और इस नोस्टलजिया से भरी दास्तान का मज़ा लीजिए। https://www.youtube.com/watch?v=nNhoT3PEWvM
